Sunday, July 27, 2014

जीने की वजह

लाख जख्म बांटती है दुनिया ,
लेकिन कुछ हाथों के पास,
उनको सीने की वजह होगी...
मै कहूँगी तो यकीं न होगा तुम्हे,
ज़रा अपने ही दिल से पूछो..
कोई तो है, जिसकी मुस्कराहट,
तुम्हारे जीने की वजह होगी..

-ममता पंडित

काश....

काश तुम्हारे क़दमों की आहट ने,चेहरे के रंग न उडाये होते..
काश उन अदाओं पर, तुम न यूं मुस्कुराये होते..
यूं न बैचैन सा रहता दिल मेरा...न साथ तुम्हारे ये बेनाम साये होते....


--ममता पंडित

स्मृति

शक्ल.... याद नहीं तुम्हारी ,
धुधली सी भी नहीं ,
चूल्हे -चौके  राशन-रोटी में,
खो गई कहीं .....
आवाज, हाँ दोनों बच्चों की आवाज
पहचान लेती हूँ...
सौ की भीड़ में भी...
तुम्हारी आवाज , पता नहीं ....
लेकिन छोटा जब भी अपने
उस दोस्त का नाम लेता है....
आखों में लौटती  है चमक...
और होठों पर एक मुस्कान खीच जाती है...
तुम्हारी  यही स्मृति बाकी है ....

-ममता पंडित

शाम

शाम कुछ मायूस थी...
मै अपने काम में कुछ ज्यादा ही मसरूफ थी..
ध्यान ही नहीं दिया वो की वो आ रही है.
बड़ी देर बाद एहसास हुआ वो जा रही है ,
अब थोड़ी देर में रात हो जाएगी ,
शाम की मायूसी मेरे साथ सो जाएगी..
मै अचानक  उठी,  भागी, और उसके पास जा बैठी..

और मेरे साथ शाम फिर खिलखिला उठी..|

-ममता पंडित 

चाबियाँ...

बहुत कीमती चीजें थी ..
दस  तालों में सहेज रखी थी उसने. .
और उससे भी ज्यादा सहेज रखीं थी चाबियाँ...
रात को सिरहाने रखती.उठ-उठ कर देखती..
चाबियाँ..जैसे उसकी  दुनियां हो गयीं थी...
और फिर एक दिन...वो खो गयी..
कितना बवाल मचाया...सारा घर सर पर उठाया...
चाबियाँ  नहीं मिली...दिन महीने साल गुजर गये..
चाबियाँ आज  तक नहीं मिली...
और उसकी जिंदगी आराम से चल  रही है...
उन्ही चीजों के  सहारे  जिन्हें सहेजा नहीं कभी...

-ममता पंडित

सुकूं..

गर उठाना हो किसी कमजोर को..
ये मत सोचना , क्यों झुकूं …
जब चल पड़ो , किसी राह पर …
ये मत सोचना, अब रुकूं…
चाहे बाहर बदले जो भी..
रखना मन में ये एक यकीं…
कोई नहीं छीन सकता…
तुम्हारे चेहरे की मुस्कराहट…
और तुम्हारे दिल का सुकूं..

-ममता पंडित